जीवन कठिन बना रही है बाँटने की राजनीति

एक बार फिर देश में जातीय और धार्मिक हिंसा के बहाने देश में विद्वेष की राजनीति करने वाले आग में घी डालने का काम कर रहे हैं। भारत में फूट डालो और राज करो की जिस नीति पर अंग्रेज चलते थे, उसी नीति को आज धर्म और जाति की राजनीति करने वाले राजनीतिक दलों ने अपना लिया है। खुद को समाज का सेवक और जातिवाद के खात्मे का संघर्ष करने की बात कहने वाले आज खुलकर विद्वेष की राजनीति कर रहे हैं।

किसी ने कभी कहा था कि सभी जातियों के बीच आपसी प्यार और सद्भाव कायम होने के बाद धीरे-धीरे जातिवाद और ऊंच-नीच का भेदभाव समाज से समाप्त हो जाएगा मगर नहीं हुआ और आज भी राजनैतिक दल हिंसा में अपनी रोटी सेंक रहे हैं।

आज कल कुछ महानुभावो के बयान इस तरह के आते है कि शरीफ़ लोगो को नींद से परे ले जाए। जिन हस्तियों का नाम इज्ज़त से लिए जाता है वो भी खुलकर फूट डालो और राज करो की नीति अपनाने वालों की खूब तरीफ करते नज़र आते हैं।
कुछ लोग हैं जो आवाज़ उठाते है, यहाँ तक कि संसद में जातिवाद को लेकर शोर मचाते है लेकिन उनकी बात वही तक सीमित रह जाती है। देश की जनता को इस पर गहन अध्ययन करना चाहिए  कि उन्हें किसे चुनना है, उन लोगो को जो बाँटने की राजनीति करके देश को और पीछे धकेल रहे है या अमन पसंद लोगो को? यह तो तय है कि धर्म और जातिवाद की राजनीति से जनता का बड़ा हिस्सा आहत है।

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