आरक्षण का सवाल और इससे उपजी हिंसा सरकार प्रायोजित है – Chanchal Bhu

आरक्षण का सवाल और इससे उपजी हिंसा ये दोनों ही सरकार के प्रायोजित कार्यक्रम हैं। इसे बारीकी से देखिए। न्यायालय में जब यह सवाल जेरे बहस था, उस समय सरकार और सरकार का एटॉर्नी कहां था? क्यों नही रखा असहमति का अपना पक्ष? आप यह भी कह कर नही बच सकते कि ‘मामूली’ सा सवाल था। एक अमित शाह को बचाने के लिए समूची न्यायपालिका को इस सरकार ने कटघरे में खड़ा कर दिया और आरक्षण जैसा बड़ा मुद्दा सामने रहा और आप इससे अनभिज्ञ रहे? इसका जवाद देना ही पड़ेगा।

आज आप कह रहे हैं कि न्यायालय के फैसले से असहमत हैं? हिंसा समूचे देश मे जानबूझ कर फैलाई गई है। और इसका श्रेय भी सरकार को जाता है। पिछले चार साल में हिंसा की बढ़ोत्तरी और खुली छूट किसने दी है? हिंसा के लिए माहौल बनाना और युवजनों के बेरोजगारी की जगह हिंसा देना, किसका काम रहा? मामूली से एक फ़िल्म के सवाल पर क्या किया करणी सेना ने ? गोरक्षा के नाम पर दलितों के साथ क्या क्या हुआ, किसी से छिपा है? अब यह भी कह कर नही भाग सकते कि यह स्वयं स्फूर्त था। सरकारें फ़िल्म प्रतिवन्धित करने का फैसला करती हैं, क्यों? क्या संदेश देते हैं युवजनों को?

वंचितों का दलितों का या किसी का भी हिंसक होना जायज नही है,नही उसका समर्थन किया जा सकता है। तुर्रा यह कि इस वर्ग के ‘कथित’ नेता पासवान से लेकर उदित राज तक कहां हैं इस समय? गोरक्षक लफंगों और करणी सेना की हिंसा को सामने रख कर इस हिंसा को जायज ठहराना और भी बेहूदगी है। ‘आंख के बदले आंख’ का सिद्धांत अगर समाज मे मान लिया होता तो आज सारी दुनिया ही अंधी होती।

आज समाज मे बिष घुल चुका है इसे मिटाना जरूरी है वरना हम पश्चिम के बहु प्रचारित उस तथ्य को सही करार दे देंगे जिसमे कहा गया है कि भारत इतनी विविधताओं से भरा है कि वह एक रह ही नही सकता। अब अंदाज लगाओ कांग्रेस ने किस सलीके से देश को संभाल कर रखा ही नही , लोकतंत्र को मजबूत कर यह भी साबित कर दिया कि यहां सत्ता और समाज मे सब की भागीदारी होती है और उसके फैसले का आदर किया जाता है। लेकिन तुमने तो लोकतंत्र की भी धज्जी बड़ी बेहूदगी से उड़ा दी जब 2 से 34 बनाने लगे? गोवा, मेघालय, गुजरात को सारी दुनिया ने देखा है।

Chanchal Bhu 

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