क्या TV मीडिया अब सुपारी मीडिया है?

ऐसा लगता है जैसे कि आज का मीडिया सुपारी मीडिया बन गया है। मीडिया का काम है सच को सामने रखना, मगर ऐसा लगता है कि मीडिया वही सामने रख रहा है जिसकी उसको सुपारी मिली हो। अगर मैं उदाहरण दूं तो पिछले दिनों आपने मशहूर अभिनेत्री श्रीदेवी की मृत्यु का प्रसारण देखा होगा। हालाँकि श्रीदेवी की मृत्यु से सरे देश को आघात लगा, लेकिंग 3-4 दिन हमारे मीडिया ने जिस तरह कवर किया, उससे ऐसा लगता था, जैसा कि देश के सरे मुद्दों को छुपा लिया गया हो। आप सब ने देखा होगा की हमारा मीडिया किस बचकाने तरीके से मशहूर अभिनेत्री श्रीदेवी की मृत्यु का प्रसारण कर रहा था। बातों को ज़बरदस्ती खींचा जा रहा था, चीज़ों को ज़बरदस्ती लम्बा किया जा रहा था।

मैं एक और उदाहरण देता हूँ, एक वीडियो हैं जिसमें में आप देखेंगे कि झारखण्ड के भाजपा लीडर तथा लातेहार जिले में 20-पॉइंट प्रोग्राम इम्प्लीमेंटेशन कमिटी के वाईस-चेयरमैन राजधनी यादव डिस्ट्रिक्ट ट्रांसपोर्ट ऑफिसर (DTO) एफ बरला पर कैमरे के सामने हमला कर रहे हैं, उन्हें मारते हुए नज़र आ रहे। दुसरी तरफ एक दूसरा वीडियो हैं जिसमें दिल्ली के मंत्री इमरान हुसैन पर दिल्ली सचिवालय के अंदर हमला किया गया। इस वीडियो में 4 से 5 लोग मंत्री इमरान हुसैन पर सचिवालय के अन्दर हमला करते हुए साफ़ दिखाई दे रहे हैं।

इसी तरह आपने देखा होगा कि दिल्ली के मुख्य सचिव ने अरविन्द केजरीवाल के घर पर अपने ऊपर हमले की बात कही। हालाँकि उस मामले का कोई भी विज़िबल सबूत सामने नहीं आया, पर हमारा मीडिया उस मामले को ३-४ दिन तक कवर करता रहा, उसके ऊपर विमर्श दिखता रहा, बहस दिखता रहा। जबकि वीडियो में कैप्चर इन दोनों ही मामलों में, जहाँ एक तरफ सीनियर अधिकारी की पिटाई की जा रही है और दूसरी तरफ दिल्ली के मंत्री पर हमला हो रहा है, किसी भी नेशनल न्यूज़ चैनल ने ३ दिन तो क्या ३ घंटे भी कवर नहीं किया, उस पर विमर्श के लिए इन चैनल्स के पास चंद मिनटों का भी टाइम नहीं था। इससे से साफ़-साफ पता चलता है कि हमारे मीडिया को इन वीडियो को दिखाने की सुपारी नहीं मिली, जबकि 3-3, 4-4 दिन तक ऐसे मुद्दों को दिखाया जिनका जनता से जुड़े मुद्दों से कोई भी सरोकार नहीं था।

अगर हम दिल्ली के प्रिंसपल सेक्रेटरी वाले इंसीडेंस की ही बात करें, तो एक वीडियो है जिसमें वह अंदर 5-6 मिनट ही ठहरे, इस पर उनका आरोप है कि अंदर किसी विज्ञापन के प्रसारण को लेकर बहस हुई और बहस इतनी अधिक बढ़ गई कि कुछ विधायकों ने उनपर हमला कर दिया। आप खुद अंदाज़ा लगाइये कि इतनी देर में राशन डिस्ट्रीब्यूट नहीं होने पर बहस हुई होगी, जैसा कि दिल्ली सरकार का दवा है या फिर सरकार के 3 साल पूरे होने पर विज्ञापन रिलीज़ नहीं होने पर बात हुई होगी, तीखी बहस हुई होगी, नोकझोक हुई होगी और मामला मारपीट तक पहुंचा होगा? क्या 5-6 मिनट में यह सब संभव है? अगर संभव भी है तो क्या यह इतना बड़ा मामला था कि उसको 3 से 4 दिन तक हमारा मीडिया लगातार दिखता रहा और इसकी आड़ में जनता से जुड़े मुद्दों को दबा दिया गया।

यह ऐसा समय था जबकि जनता से जुड़े हुए कई मुद्दे सामने रहे थे, एक के बाद एक कई बैंक घोटाले सामने आ रहे थे, फिर चाहे पीएनबी घोटाला हो या रोटोमैक घोटाला। इसके अलावा भी और कई 3-4 घोटाले सामने आए, लेकिन इन रिपोर्टिंग की वजह से सरे घोटालों की बातें कहीं छुप गई। ऐसा लगता है जैसे जनता के बीच चल रहे माउथ कैम्पेन को दबा दिया गया हो।

अगर मीडिया आपकी बात नहीं दिखता है, बल्कि इसकी जगह अपनी पसंद के मुद्दों पर विमर्श दिखाए, बहस दिखाए तो क्या इसे सुपारी मीडिया नहीं कहा जाना चाहिए?

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